मैं एक छोटा सा माटी का गुड्डा
हमारे यहाँ मिट्टी का एक घड़ा था|
गरमी के दिनों में पानी ठंढा रखने के काम आता|
खाना बनाते समय एकदिन किसी ने गिलास में लहसुन कूटा और फिर लहसुन निकाल लेने के बाद उसे (गिलास को) धोना भूल गया| ठीक उसी दिन किसी को प्यास लगी और उसने देखे बिना उसी गिलास को घड़े में डुबो दिया| अब पूरे घड़े में लहसुन की बास भर गई|
सारा पानी हटा कर नया पानी डाला गया| अन्दर-बाहर से कई-कई बार उसे धोया भी गया लेकिन बास नहीं गई| लहसुनिया गन्ध के साथ अब घड़ा किसी काम का नहीं रह गया| अंततः घड़े को तोड़ कर उसकी जगह नया घड़ा लाया गया|
अपने अंतिम समय तक घड़े ने लहसुन की गन्ध का साथ नहीं छोड़ा| छोड़ता भी कैसे! जो कोई बास उसके भीतर आई तो उसके रह जाने की निशानी भला क्यों मिटाता!
कहावत है 'सोना-सज्जन साधुजन टूटे-जुटे सौ बार, दुर्जन कुम्भ कुम्हार के एक धक्के दरार'
सोना सौ बार टूटता है और दो सौ बार उसे जोड़ा जाता है| इतने बार टूट जाने और फिर इतनी बार दोबारा जुड़ने के बीच इनके फिर से कई बार टूटने-जुटने की आदत नहीं जाती| जबकि कुम्हार का कुम्भ एक ही बार में ख़त्म हो जाता है|
किसी पुरानी फ़िल्म का गाना भी है, ''मैं माटी का गुड्डा रे गुड्डा तू सोने की गुड़िया''
प्रेम में अक्सर ऐसा ही होता है| प्रेमी और प्रेमिका के बीच इसी सोना-माटी वाला अंतर हो जाता है| कई बार प्रेमी वो घड़ा हो जाते हैं जो प्रेम के एहसास, प्रेमिका की गन्ध को अपने आख़िरी लम्हे तक ख़ुद के भीतर बसाए रहते हैं| तो सोने की गुड़िया प्रेमिकाएँ... सोना जिसे दूसरे गहने के लिए तोड़ लिया जाएगा, किसी और गहने में ढल कर वे अपनी पुरानी रचना, पुराना रूप भूल जाएँगी|
कई बार माटी हो सकने की क्षमता प्रेमिकाओं को नसीब होती है,
''मैं हूँ एक छोटा सा माटी का गुड्डा
तुम्हीं प्राण मेरे तुम्हीं आत्मा हो
तुम्हीं मेरे हमदम मेरे हमसफर
G.


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