Simble of Love (A love story) Tajmahal, Madinah
#दास्ताने_मुहब्बत (A love story)
शाहजहां ने मुमताज़ की याद में #ताजमहल बनाया तो दुनिया ने उसे सिम्बल ऑफ लव माना ..... लेकिन मस्ज़िद ए नबवी के साथ मुहब्बत की एक ऐसी हैरतअंगेज दास्तान जुड़ी है जो उससे पहले या बाद में कभी दोहराई नहीं गयी .....
यह महज़ मस्जिद नहीं थी बल्कि मदीना के दारुल ख़िलाफ़त बनने के बाद यह मस्ज़िद एक सुप्रीमकोर्ट भी थी जहां मुहम्मदﷺ अदल ओ इंसाफ और सामाजिक मसाइल का हल फरमाते ,
यह पार्लियामेंट भी थी जहां पर तमाम दीगर ओहदे दारों के साथ मंसूबा बन्दी तै होती।
जंगी मराहिल और ज़िहाद की ट्रेनिंग के लिए मस्ज़िद का आंगन में जंगी मश्कें होतीं ।
सबसे बड़ी बात कि मस्जिदे नबवी का एक हिस्सा जहां रोज़ा ए मुबारक है वह हज़रते अम्मा आएशा रज़ि. का हुज़रा था जिस के ऊपर सब्ज़ गुम्बद है ।
सब्ज़ गुम्बद जो आज मदीना मुनव्वरा की पहचान है यह मस्जिद हमेशा से ऐसी नहीं थी ....
इसे मुहम्मद ﷺ ने अपने दौर में खजूर की लकड़ी पत्तियों से तामीर करवाया .... हज़रते उमर रज़ि. ने रौजा ए मुबारक के गिर्द दीवार तामीर की और हज़रते उस्मान रज़ि. ने अपने दौरे ख़िलाफ़त में यहाँ ज़रूरी तामिरी काम किया ।
एक बारिश में रौज़ा ए मुबारक की दीवार को नुकसान हुआ तो उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रह. ने वह दीवार बनवा दी ....
अब्बासी ख़लीफ़ा मुतावक्किल ने संग ए मरमर का फ़र्श बनवाया उसके बाद अब्बासी ख़लीफ़ा अल मुक्तफ़ी ने चंदन और आबनूस की लकड़ी की खिड़कियां रोज़ा ए मुबारक पर लगवाईं ,, साफ़ चमकदार पत्थरों से हरम ए नबवी को सजाया ।
668 हिज़री में सुल्तान रुकनुद्दीन बेबरस सबसे पहले रोज़ा ए रसूल ﷺ के इर्द गिर्द जालियां लगवाईं
इसके लगभग दस बाद 678 हिज़री में ममलूक सुल्तान मन्सूर कलावून ने सबसे पहले रोज़ाये अक़दस पर लकड़ी का गुम्बद तामीर कराया जिसका रंग उस वक़्त पीला था .. बाद में इसका रंग सफ़ेद हुआ ....
1837 ई. में उस्मानी ख़लीफ़ा सुल्तान महमूद खान बिन अब्दुल हमीद ने जब मस्ज़िद ए नबवी को और ज़्यादा भव्य बनाने और उस पर एक बेमिसाल गुम्बद बनाने का अज़्म किया ,,
पूरी सल्तनते इस्लामिया में ऐलान करवा कर उस वक़्त के सबसे बेहतरीन 500 कंस्ट्रक्टरस को एक शर्त के साथ शहर में एक अलग कॉलोनी में बसाया गया .... शर्त यह थी कि वह अपने बच्चों को वही तामिरी हुनर देंगे जो उनके पास है ,, और ख़लीफ़ा ने उन बच्चों की इस्लामिक तालिमो तरबियत के लिए टॉप उस्तादों को मुकर्रर किया वह सभी बच्चे हाफ़िज़ा कुरान मुक़म्मल कर चुके , उसके बाद उनको मदीना मुनव्वरा मस्जिदे नबवी भेजा गया ..... काम करते वक़्त बा वजू रहने का सख़्ती से ताक़ीद की गई थी ,, हालांकि उन बच्चों की तरबियत ऐसी थी कि उन्हें किसी ताक़ीद की ज़रूरत नहीं थी ....
इतना। पास_ओ_लिहाज़ रखा गया था कि पत्थर लकड़ी की कटाई छंटाई के लिए मदीना शहर से दूर एक जगह मुकर्रर की गई थी जिससे मदीना या रोज़ा मुबारक के पास बिल्कुल शोर शराबा न हो ,, जब कोई पत्थर कटाई छटाई होना होता तो वह मदीना के बाहर उसी जगह ले जाया जाता .... रोज़ाये मुबारक को चादर से ढक दिया जाता जिससे गर्दो गुबार से महफूज़ रहे .....
इस क़दर एहतियात और पास ओ लिहाज़ , और अक़ीदत का मुज़ाहिरा कभी किसी तामीर में नहीं किया गया ...
उस्मानियों की आप ﷺ से अक़ीदत का यह आलम था कि जब पहली मर्तबा ऑटोमन में इलेक्ट्रिसिटी तैयार की गई तो सबसे पहले मदीना और मस्जिदे नबवी को मुनव्वर किया गया उसके काफी वक़्त बाद इस्ताम्बुल को इलेक्ट्रिसिटी दी गयी ।
यह वह बेलौस मुहब्बत थी जो उसके बाद कभी दोहराई नहीं गयी ....
बारीक बीनी का यह आलम था कि हज़रते अम्मा आएशा रज़ि. के बकौल एक ब्लेसिंग खिड़की को उस गुम्बद पर तामीर करना नहीं भूले जो आसमान से रौज़ा ए मुबारक़ की तरफ खुलती है ..
लेकिन यह बेमिशाल मुहब्बत अक़ीदत की निशानी सब्ज़ गुम्बद 1928 में तोड़ने की मंसूबाबन्दी हुई .....
ईस्ट इंडिया कम्पनी और अल सऊद + बहाविज़म समर्थक अलाइंस से उस्मानियों के हारने के बाद 1926 #हिजाज़ ( सऊदी अरब) अल सऊद के ज़ेरे इक़तिदार चला गया .... सबसे पहले ऑर्थोडॉक्स रूस ने सऊदी हुक़ूमत को रिकॉगनाइज़ किया और एक अरसे के बाद किसी गुप्त सन्धि समझौते के मुक़म्मल होने के बाद इसे कैथलिक इंग्लैंड ने रिकॉगनाइज़ किया और उसके बाद हिजाज़ का नाम बदल कर सऊदी किया गया और तुर्क हुक़ूमत की निशानियों को मिटाया गया
सुल्तान बिन अब्दुल अज़ीज़ उर्फ इब्ने सऊद और बहाविज़म आंदोलन गठजोड़ की शर्तों पर अमल के रूप में जन्नतुल बक़ी कब्रिस्तान में आले रसूल और कई ज़लीलुल कद्र साथी सहाबा अहबाब की मुक़द्दस कब्रों को ज़मी दोज़ कर दिया गया ....
इसी क्रम में हुज़ूर ए अक़दस मुहम्मद ﷺ के मक़बरे को भी ज़मी दोज़ करने , सैय्यदना अबु बक्र रज़ि. और सैय्यदना उमर फारूक रज़ि. की कब्र मुबारक को ज़मीदोज़ करने और सब्ज़ गुम्बद को गिराने (नौजबिल्लाह) की मुहिम चली .... एक कॉन्सपिरेसी है कि एक बदबख़्त गुम्बद को ढहाने के लिए उसके ऊपर चढा और बिजली कड़क कर ऐसी गिरी कि वहीं मर गया ,,
पूरी दुनिया में उम्मते मुस्लिमा ने सख़्त रद्दे अमल और गमो गुस्से का इज़हार किया ....... और अक़ीदत मन्दों के सख़्त रद्दे अमल के हिसार में ग्रीन डोम आज बा हिफाज़त है ....
यह पुर असरार मुहब्बत ऐसी है कि कोई मुहम्मद ﷺ का नाम लेता है तो सब्ज़ गुम्बद ज़हन में आता है और जब कहीं सब्ज़ गुम्बद की तस्वीर दिख जाती है तो अनायास ही ﷺ का ख्याल आता है और दरूद भेजा जाता है ....
मुहब्बत उखुव्वत और अक़ीदत की निशानी सब्ज़ गुम्बद क़यामत तक उम्मते मुस्लिमा की आंखों को ठंडक पहुचाता रहेगा इंशाअल्लाह ।
Tasneem Nazim Ghazi


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