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दूसरे लोग जो की नबी पाक की जात पर सवाल उठाते हैं।

 

दूसरे लोग जो की नबी पाक की जात पर सवाल उठाते हैं।

—————अक्सर नास्तिक या फिर और भी दूसरे लोग जो की नबी पाक की जात पर सवाल उठाते हैं।नबी पाक पर अहतराजात की उँगलियाँ उठाते हैं।उन्हीं सवालों में से एक सवाल यह किया जाता है की नबी पाक ने मारिया किबतिया को अपनी लौंडी बना कर रखा और उन से एक औलाद इब्राहीम भी पैदा हुई ।नबी पाक ने मारिया किबतिया को अजाद भी नहीं किया।जब की आप ख़ुद लोगों को ग़ुलाम आज़ाद करने का हुक्म देते थे। 



—————एक बात याद रखना नबी पाक ने कभी भी किसी को ग़ुलाम नहीं बनाया।जिस ज़माने में जिस जगह पर आप नबी बना कर भेजे गए उस जगह पर और बाक़ी सारी जगहों पर ग़ुलामी मौजूद थी।ग़ुलाम बेचे ख़रीदे जाते थे।मर्द को ग़ुलाम और औरत को लौंडी(बाँदि)कहा जाता था।यह जाहलाना काम सिर्फ़ अरब में ही नहीं सारी दुनिया में हो रहा था।बल्कि ये ग़ुलामी का दौर अभी जल्द ही अमेरिका में कुछ चंद सदी पहले ख़त्म हुआ है।उस वक़्त सारी दुनिया में ग़ुलाम थे।अरब,ईरान,अफ़्रीका,मिस्र कोई जगह ऐसी नहीं थी की जहाँ ग़ुलाम ना पाए जाते हों। 

——————अब सवाल यह पैदा होता है की आख़िर ये ग़ुलामी पैदा कैसे हुई? 

———तो आप यह जान लें की जब कबीलों के दरम्यान जंगें होनी शुरू हुई छोटी छोटी बातों पर छोटे छोटे जहिलाना रीति रिवाजों पर।तो जो क़ाबिला पहले जिस क़बीले पर हमला करता था।यानी हमला करने वाला कबीला जब दिफ़ा करेने वाले कबीले से हार जाता था तो सज़ा के तौर पर पूरे क़बीलों के मर्द और औरतों को ग़ुलाम और लौंडियाँ बना लिया जाता था।ये तरीक़ा क़दीम ज़माने से चलता चला आ रहा था।इसी लिए जंगों में पकड़े गए क़ैदियों के मामले में यह रिवाज चल पड़ा की उन्हें ग़ुलाम बना लिया जाय। 


—————नबी पाक सल्लल्लाह ओ अलैहिवसल्लम के ज़माने में दस बीस नहीं सैकड़ों की तादाद में गुलाम मौजूद थे।उन को बेचने के लिये बाज़ार लगते थे।गुलमों को बेचने ख़रीदने का कारोबार होता था।अब नबी पाक के सामने एक चैलेंज था की इन्हें ख़त्म कैसे किया जाए।अल्लाह पाक ने कभी भी इस को पसंद नहीं किया।ग़ुलाम ख़रीदना बेचना इस्लाम का कोई हिस्सा नहीं है।यह एक तकलीफ़ दह सूरत थी।इस ग़ुलामी को ख़त्म करने के लिए पहला काम यह किया गया कि वो जो पुराना रिवाज था क़ैदियों को ग़ुलाम बनाने का।उस रिवाज का ख़ात्मा किया जाय।उस के ख़ात्मे का फ़ैसला किया जाय।क़ुरान में सूरह मोहम्मद जिस में पहली मरतबा वह मौक़ा आ गया की मुसलमानों को जंग करनी थी।यानी जंगे बदर तो अल्लाह ने जंग के पहले कुछ हिदायत की।और उस हिदायात में यह बात वाजह कर दी की जब जंग हो जाए और जंग में जो क़ैदी पकड़े जाएँ तो क़ैदियों के बारे में अब कोई सवाल नहीं है की उन्हें ग़ुलाम बनाया जाय।बल्कि अब अल्लाह का एक ही क़ानून हैं की या उन से कुछ माल ले कर छोड़ दिया जाय गा।या फिर अहसान के तौर पर छोड़ दिया जाए गा। 



——————4. अतः जब इनकार करनेवालो से तुम्हारी मुठभेड़ हो तो (उनकी) गरदनें मारना है, यहाँ तक कि जब उन्हें अच्छी तरह कुचल दो तो बन्धनों में जकड़ो, फिर बाद में या तो एहसान करो या फ़िदया (अर्थ-दंड) का मामला करो, यहाँ तक कि युद्ध अपने बोझ उतारकर रख दे। यह भली-भाँति समझ लो, यदि अल्लाह चाहे तो स्वयं उनसे निपट ले। किन्तु (उसने या आदेश इसलिए दिया) ताकि तुम्हारी एक-दूसरे की परीक्षा ले। और जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे जाते है उनके कर्म वह कदापि अकारथ न करेगा:सूरह मुहम्मद(४) 

————क़ुरान ए मजीद ने इस तरह से ग़ुलामी से पैदा होने और ग़ुलाम मर्द औरत के बंनने का रास्ता बंद कर दिया।लेकिन सवाल यह पैदा होता है की जो पहले से मौजूद थे उन का क्या किया जाय?क्या उन को घर से निकाल दिया जाय उन को बे सोंचे समझे आज़ाद कर दिया जाय।अगर औरतों के साथ ये मामला कर दिया जाता तो उन को सर छुपाने की जगह तक ना मिलती और खुलेआम बदकारियाँ करतीं सो अलग।आख़िर पेट और खवाहिशात भी तो है उन के पास।अगर उन्हें ऐसे ही छोड़ दिया जाता तो आख़िर उन की ज़रूरत पूरी कौन करता।उस वक़्त कोई हुकूमत भी नहीं थी की उन के लिए कोई बंदो बस्त कर सके।अगर मानलो अगर उन के खाने पीने का बंदो बस्त हो भी जाता तब भी उन की जो जिस्मानी ज़रूरत है उसे कौन पूरा करता।नतीजा यह निकलता की वोह अपना जिस्म बेचना शुरू कर देतीं या फिर औरत औरत के साथ लेसबियन वाला मामला शुरू हो जाता।मर्द ग़ुलामों का यही मामला था की अगर उन को घर से निकाल दिया जाता तो कोई और ग़ुलाम बना लेता।या फिर पेट पालने के लिए चोरी चमारी डाकाजानी शुरू कर देते।ज़ाहिर सी बात है वोह पहले आप के घर में थे उन को छत मिली हुई थी उन को आप खान पीना दे रहे थे।अगर ऐसे ही बाहर निकाल दिया जाता तो मुआशरे में बेहूदगी बढ़ जाती। इसी लिए इस लानत को ख़त्म करें के लिए एक ग्रेजुएल प्रोसेस इस्तिमाल किया गया।और लोगों को तालीम दी गई की तुम हालात के हिसाब से अगर अच्छा समझते हो तो जिस को चाहो आज़ाद कर दो।

(90;13. किसी गरदन(ग़ुलाम)का छुड़ाना فَكُّ رَقَبَةٍ) 

————इसी तरह एक और प्रोसेस इस्तेमाल किया गया कि नफ़सियात तब्दील करो तो नाम तब्दील कर दिए गए ।मतलब पहले इन को ग़ुलाम नाम से बुलाया जाता था।तो अल्लाह ने कहा की इन को ग़ुलाम नाम से नहीं बल्कि मिलके यमीन कह कर बुलाओ।या फिर फतात कह कर बुलाओ।मतलब वोह नाम ही बदल दिया गया जिस में ग़ुलामी छलकती थी।ता की वोह नफ़सियाती तौर पर ख़ुद को बदलें।फिर उन ग़ुलामों की आपस में अल्लाह ने निकाह भी करने का हुक्म दिया।और मालिक को भी आज़ाद ग़ुलाम से निकाह करने को कहा।अल्लाह ने क़ुरान में यहाँ तक कह दिया की इन को जो खाते हो खिलाओ जो पहेनते हो पहनाओ ताकि वोह जिस्मानी और नफ़सियाती तौर पर ख़ुद को ग़ुलामी से आज़ाद करें।उन को अल्लाह ने बराबरी का स्टेटस दे कर ग़ुलाम और मालिक के बीच की खाई को अल्लाह ने बंद कर दिया।अल्लाह ने ग़ुलाम का ख़याल रखने और उन से अच्छा सलूक रखने की बहुत सी बातें क़ुरान में नुज़ूल फ़रमाई। 

——————फिर उस के बाद एक और प्रोसेस इस्तेमाल किया गया कि अगर कोई लौंडी या फिर मर्द ग़ुलाम अपने आप को अपने पैर पर खड़ा करना साबित कर दे तो उस के बदले में उन को आज़ाद कर दिया जाए गा ता की वोह ख़ुद तिज़ारत करें और ख़ुद से कमा खा सकें। 



—————24;32. और अपनी (क़ौम की) बेशौहर औरतों और अपने नेक बख्त गुलामों और लौंडियों का निकाह कर दिया करो अगर ये लोग मोहताज होंगे तो खुदा अपने फज़ल व (करम) से उन्हें मालदार बना देगा और ख़ुदा तो बड़ी गुन्जाइश वाला वाक़िफ कार है 

————24;33. और जो विवाह का अवसर न पा रहे हो उन्हें चाहिए कि पाकदामनी अपनाए रहें, यहाँ तक कि अल्लाह अपने उदार अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर दे। और जिन लोगों पर तुम्हें स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो उनमें से जो लोग लिखा-पढ़ी के इच्छुक हो उनसे लिखा-पढ़ी कर लो, यदि तुम्हें मालूम हो कि उनमें भलाई है। और उन्हें अल्लाह के माल में से दो, जो उसने तुम्हें प्रदान किया है। और अपनी लौंडियों को सांसारिक जीवन-सामग्री की चाह में व्यविचार के लिए बाध्य न करो, जबकि वे पाकदामन रहना भी चाहती हों। औऱ इसके लिए जो कोई उन्हें बाध्य करेगा, तो निश्चय ही अल्लाह उनके बाध्य किए जाने के पश्चात अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।  

———अब बात करते हैं की अगर कोई ग़ुलाम औरत किसी मर्द के पास है तो उस मर्द का रव्य्या अपनी लौंडी के लिए कैसा होना चाहिए।अब इस की तरबियत कौन दे गा।     
 एक बात याद रखना नबी जब किसी सोसाएटी में होता है तो वोह उस सोसाइटी के मुताबिक़ ही अपना रवय्या रखता है।जब तक सोसाइटी और सोसाइटी वाले उस जिहालत से बाहर ना निकल जाएँ। 

——————नबी पाक ने हर जायज़ कटेगरी में लोगों के लिए और इंसानियत के लिए काम किया है।उसी एक केटेगरी में ग़ुलामी और लौंडी भी आता है।नबी पाक ने अम्माँ मारिया किबतिया(ra)से रिश्ता क़ायम किया।ता की सोसाइटी वाले इस से यह सीखे की एक बाँदी ग़ुलाम को अपने साथ कैसे रखना है।उस का ख़याल कैसे रखना है।उस के हकूक उस की ज़रूरतों का पूरा ख़याल कैसे रखना है।इसी लिए उस हालात के मुताबिक़ ये बिल्कुल सही नहीं था की अल्लाह का रसूल समाज से बिल्कुल ही अलग खड़ा हो जाय। 

————नबी पाक के दौर में मिस्र की हुकूमत मकौक़स बादशाद के हाथ में थी।वो नबी पाक पर ईमान तो ना ला पाया था लेकिन आप की बहुत इज़्ज़त करता था।उस ने दो लौंडिया नबी पाक को दी।एक का नाम सीरीन था और दूसरे का नाम मारिया किबतिया (ra) था।ये वही किबति ख़ानदान था जिस में अम्माँ हाजरा(sa)पैदा हुईं।इसी ख़ानदान से हज़रत इब्राहीम(as)की बीवी हज़रत हाजरा(sa)भी थीं।मैं हैरान होता हूँ की इब्राहीम (as)और हज़रत सारा और हाजरा(sa)से बनी इसराईल और बनी इसमाईल में नबूवत का सिलसिला शुरू हुआ।और फिर उसी तरह किबति क़बीले की ही औरत मारिया किबतिया(ra) के पेट से इब्राहीम नाम के बच्चे को पैदा कर के फिर बच्चे को मौत दे कर अल्लाह ने नबूवत का सिलसिला ही ख़त्म कर दिया। 

————नबी पाक को जब ये दोनो बंदियाँ दी गई तो आप ने एक को आज़ाद कर दिया और एक को रख लिया अरब समाज की तरबियत के लिए की ग़ुलाम आज़ाद करों।और अगर रखो तो इस तरह रखो की जैसे मैं रखता हूँ।अल्लाह ने और अल्लाह के रसूल ने ग़ुलाम बाँदियों का स्टेटस बीवियों की तरह रखने का हुक्म दिया यहाँ तक की अगर उस ग़ुलाम औरत की कोई औलाद हुई तो बाप के जायज़ाद में बराबर का वारिस होगा।और बाप के नाम का पूरा हक़दार हो गा उस औलाद को उस के बाप के नाम से बुलाया जाएगा। 

————अखरी बात की नबी पाक ने अम्माँ मारिया क़िब्तिया(ra)को आज़ाद क्यूँ नहीं किया। इस की वजह ये है की नबी अगर किसी औरत से हलाल तरीक़े से जिस्मानी ताल्लुकात क़ायम कर ले तो उस औरत पर दूसरा मर्द हराम है। अब वोह औरत उम्मत की माँ में शुमार की जाए गी।अम्माँ मारिया क़िब्तिया हमारी माँ हैं।अम्माँ आयशा(ra)फ़रमाती है की मैं ने मारिया क़िब्तिया जैसी तहज्जुद गुज़ार औरत पहले कभी नहीं देखी।आप हज़रत उमर (ra)की ख़िलाफ़त तक ज़िंदा रहीं।आप के लिए एक रक़म नबी पाक(saw) ने मुतय्यन कर दिया था जिसे हर महीने आप को आप के घर पहुँचा दिया जाता था।आप का का इंतिकाल हज़रत उमर के अखरी दौर में हुआ।और आप का जनाजा हज़रत उमर(ra)ने पढ़ाया था।।
________SAdik_Husain_Ansari________

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